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Rukoo me Shaamil hona/ रुकु में शामिल होना

Rukoo me Shaamil hona/ रुकु में शामिल होना (Hindi/Urdu)

imam ke Saath rukoo me samil hona
Rukoo me Shaamil hona/ रुकु में शामिल होना 



इमाम के साथ Rukoo me Shaamil hona क्या इस से नमाज़ की रकअत पूरी होती है या नहीं, और इसके सही होने का मसला इस्लामी फिक्ह और हदीस में एक महत्वपूर्ण विषय है। इस मसले में आमतौर पर यह सवाल होता है कि अगर कोई व्यक्ति नमाज़ की जमात में उस समय शामिल हो, जब इमाम रुकू में हो, तो क्या उसकी नमाज़ पूरी हो जाएगी? इस मसले पर कुछ हदीसें और आलिमों के बयान इस प्रकार हैं:


📖 Table of Contents

    हदीस की रौशनी में:

    🔹हज़रत अबू बकरा रज़ी: का वाक़िया:

    सही बुखारी में एक हदीस है कि हज़रत अबू बकरा رضی اللہ عنہ एक दिन नमाज़ के लिए आए तो इमाम रुकू में थे। उन्होंने बिना सफ़ में शामिल हुए रुकू किया और फिर सफ़ में जाकर शामिल हो गए। नमाज़ के बाद नबी करीम ﷺ ने फरमाया: "ज़ादक अल्लाह हिर्सन वला तअद"। अनुवाद: "अल्लाह तुम्हारी मेहनत को बढ़ाए, लेकिन आगे ऐसा मत करना।" (सही बुखारी: 783)

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    इससे यह मालूम होता है कि हज़रत अबू बकरा की नमाज़ को नबी करीम ﷺ ने क़ुबूल किया, हालांकि उन्होंने सफ़ में पहुंचने से पहले रुकू कर लिया था। हालांकि रुकू में शामिल होकर रकअत पूरी हो जाती है, लेकिन बिना जल्दी किए और शांति से नमाज़ को पूरा करना बेहतर है।

    🔹इमाम के रुकू में शामिल होने का मसला:

    हज़रत अबू हुरैरा رضی اللہ عنہ से रिवायत है कि रसूल अल्लाह ﷺ ने फरमाया:
    "जिसने इमाम के साथ रुकू पाया, उसने रकअत पा ली।" (सनन इब्न माजा: 880)

    रसूल अल्लाह ﷺ ने फरमाया:

    مَنْ أَدْرَكَ الرُّكُوعَ فَقَدْ أَدْرَكَ الرَّكْعَةَ
    (अनुवाद: जिसने रुकू को पा लिया, उसने रकअत पा ली।)
    (अबू दाऊद: 893, नसाई: 545)

    यह हदीस बताती है कि अगर कोई व्यक्ति इमाम के रुकू में शामिल हो जाता है, तो उसकी रकअत पूरी हो जाती है, और जमात में उसकी शिरकत सही मानी जाती है।

    फुक़हा का मत:

    🔹हनफ़ी फिक्ह के अनुसार:

    फ़ुक़हा-ए-हनफ़िया का मत है कि यदि कोई व्यक्ति इमाम के रूकू में शामिल हो जाए और रूकू को इमाम के साथ सही तरीके से इत्मीनान से अदा करे, तो उसे वह रकअत मिल जाती है। हनफ़ी फिक़्ह में यह दलील दी गई है कि रकअत के लिए रूकू एक बुनियादी हिस्सा है, और अगर यह इमाम के साथ अदा हो जाए, तो रकअत पूरी मानी जाती है।हदीस "من أدرك الركوع فقد أدرك الركعة" से यह साबित होता है कि रुकू में शामिल होने से रुकअत पूरी हो जाती है, और उसके बाद के अन्य हिस्से (सजदा) के लिए इमाम के साथ मिलकर किया जाए तो नमाज़ पूरी होती है।

    🔹फिक़्ह शाफ़ई:

    फिक़्ह शाफ़ई के अनुसार, अगर मुक़्तदी (नमाज़ी) रुकू में इमाम के साथ शामिल हो जाए और इमाम से पहले रुकू से सिर न उठाए, तो उसकी रकअत पूरी हो जाएगी। शर्त यह है कि रुकू पूरी तरह से इमाम के साथ किया जाए और मुक़्तदी इत्मीनान (सुकून) के साथ रुकू में रहे।

    🔹मालिकी फिक्ह:

    मालिकी फिक्ह के मुताबिक, अगर मुक़्तदी रुकू में इमाम के साथ शामिल हो जाए, तो रकअत मिल जाती है। लेकिन शर्त यह है कि मुक़्तदी रुकू के दौरान इमाम को पा ले और नमाज़ के बाकी अरकान (क्रियाएं) सही तरीके से अदा करे।

    🔹हंबली फिक्ह:

    हंबली फिक्ह के अनुसार भी, अगर मुक़्तदी रुकू में इमाम को पा ले, तो उसकी रकअत पूरी हो जाएगी। बशर्ते कि वह रुकू की हालत में इमाम के साथ शामिल हो और नमाज़ के अन्य अरकान को सही तरीके से अदा करे।

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    मसले की व्याख्या:

    उलमा इस बात पर सहमत हैं कि हनफ़ी, शाफ़ई, मालिकी और हंबली सभी फिक्ह का मत यह है कि इमाम के रुकू में शामिल होना नमाज़ की तकमील (पूर्ति) का हिस्सा है।

    अगर मुक़्तदी इमाम के रुकू में शामिल हो जाए और इत्मीनान (सुकून) से रुकू करे, तो वह रकअत पूरी मानी जाती है।
    लेकिन अगर मुक़्तदी रुकू के बाद शामिल हो, तो उसकी वह रकअत नहीं मानी जाएगी और उसे नमाज़ के अंत में उस रकअत को अलग से पूरा करना होगा।


    Rukoo me Shaamil hona/ रुकु में शामिल होना
    Rukoo me Shaamil hona/ रुकु में शामिल होना 

     

    उलमा के विचार:

    🔹 इमाम इब्न तैमिया (रह.):

    इमाम इब्न तैमिया رحمہ اللہ के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति रुकू के दौरान इमाम के साथ शामिल हो जाता है, तो उसकी रकअत पूरी मानी जाएगी। क्योंकि नबी ﷺ के फरमान के अनुसार, रुकू पाना रकअत पूरी करने के लिए पर्याप्त है।

    🔹 इमाम इब्न क़य्यम  (रह.):

    इमाम इब्न क़य्यम رحمہ اللہ ने भी इस बात पर ज़ोर दिया है कि मुक़्तदी (नमाज़ी) का रुकू में शामिल होना उसकी रकअत के गिने जाने के लिए पर्याप्त है।

    🔹 मुफ़्ती तकी उस्मानी:

    मुफ़्ती तकी उस्मानी के अनुसार, अगर मुक़्तदी इमाम के रुकू में शामिल होकर "तकबीर-ए-तहरीमा" के बाद तुरंत रुकू कर ले, तो उसकी वह रकअत मानी जाएगी। लेकिन यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि यह अमल जल्दबाज़ी के बिना इत्मीनान से किया जाए।

    🔹इमाम नववी (रह.):

    इमाम नववी ने अपनी पुस्तक अल-मजमूअ में लिखा है कि अगर कोई व्यक्ति रूकू में इमाम के साथ शामिल हो जाए और उसके साथ रूकू अदा करे, तो वह रकअत पूरी मानी जाएगी।

    🔹इब्न कुदामा (रह.):

    इब्न कुदामा ने अल-मुग़नी में लिखा है कि जो व्यक्ति रूकू में इमाम को पा ले, वह रकअत को पा लेता है, और इस पर विद्वानों का इत्तिफ़ाक़ है।

    🔹फ़तावा आलमगीरी (हनफ़ी फिक़्ह):

    इसमें स्पष्ट किया गया है कि अगर कोई रूकू में शामिल हो जाता है, तो उसकी रकअत सही है और उसे दोबारा अदा करने की ज़रूरत नहीं।

    रुकू में शामिल होने से नमाज़ पूरी हो जाती है, बशर्ते:

    मुक़्तदी (नमाज़ी) तकबीर-ए-तहरीमा कहने के बाद रुकू करे।
    इमाम के रुकू में शामिल होकर उसके साथ रुकू पूरा करे।
    इमाम के रुकू से पहले या बाद में सिर उठाने में कोई असमानता न हो।

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    Conclusion:

    हदीस और उलमा के विचारों से यह स्पष्ट होता है कि अगर रुकू में इमाम के साथ शामिल हो जाए, तो रकअत मिल जाती है, बशर्ते रुकू इमाम के साथ पूरा किया जाए और सुकून का ख्याल रखा जाए। हालांकि, बेहतर यही है कि नमाज़ को जल्दबाज़ी के बिना इत्मीनान से पूरा किया जाए ताकि सुन्नत के मुताबिक अमल हो।

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    رُکوع میں شامل ہونا

    امام کے ساتھ رکوع میں شامل ہونے سے نماز کی رکعت پوری ہوجاتی ہے یا نہیں اور اس کے درست ہونے کا مسئلہ اسلامی فقہ اور حدیث میں ایک اہم موضوع ہے۔اس مسئلے میں عمومی طور پر یہ سوال ہوتا ہے کہ اگر کوئی شخص نماز کی جماعت میں اس وقت شامل ہو جب امام رکوع میں ہو، تو کیا اس کی نماز مکمل ہو جائے گی؟ اس سلسلے میں مختلف احادیث اور علماء و فقہاء کرام کے اقوال درج ذیل ہیں:

    1. حدیث شریف سے رہنمائی:

    🔅حضرت ابو بکرہ رضی اللہ عنہ کا واقعہ:

    صحیح بخاری میں روایت ہے کہ حضرت ابو بکرہ رضی اللہ عنہ ایک دن نماز کے لیے آئے تو امام رکوع میں تھے۔ انہوں نے بغیر صف میں شامل ہوئے رکوع کیا اور پھر صف میں جا کر شامل ہو گئے۔ نماز کے بعد نبی کریم ﷺ نے فرمایا:"زادک اللہ حرصًا ولا تعد."
    ترجمہ: "اللہ تمہاری محنت کو بڑھائے لیکن آئندہ ایسا نہ کرنا۔"(صحیح بخاری: 783)
    اس سے یہ معلوم ہوتا ہے کہ حضرت ابو بکرہ کی نماز کو نبی کریم ﷺ نے قبول فرمایا، حالانکہ انہوں نے صف میں پہنچنے سے پہلے رکوع کر لیا تھا۔اگرچہ رکوع میں شامل ہو کر رکعت ادا ہو جاتی ہے، لیکن بغیر سکون اور جلدی کے نماز کو مکمل کرنا افضل ہے۔

    🔅 امام کے رکوع سے نماز کی جماعت میں شمولیت:

    حضرت ابوہریرہؓ سے روایت ہے کہ رسول اللہ ﷺ نے فرمایا:
    "جس نے امام کے ساتھ رکوع پایا، اس نے رکعت پالی۔"(سنن ابن ماجہ: 880)
    رسول اللہ ﷺ نے فرمایا:"مَنْ أَدْرَكَ الرُّكُوعَ فَقَدْ أَدْرَكَ الرَّكْعَةَ"/"من أدرك الركوع فقد أدرك الصلاة."
    (ترجمہ: جو شخص رکوع کو پالے، اس نے رکعت کو پالیا) "جس نے رکوع کو پا لیا، اس نے نماز کو پا لیا۔"(ابو داؤد: 893، نسائی: 545)
    یہ حدیث اس بات کی وضاحت کرتی ہے کہ اگر کوئی شخص امام کے ساتھ رکوع میں شامل ہو جائے، تو وہ رکعت کو پا لیتا ہے۔ اس کی جماعت میں شمولیت درست ہو گئی۔

    2. فقہاء کرام کے اقوال:

    فقہ حنفی:

    حنفی فقہ کے مطابق، نماز میں رکوع میں شامل ہونے کے لیے ضروری ہے کہ آپ امام کے پیچھے ہوں اور رکوع میں داخل ہونے سے پہلے آپ نے تکبیر کہہ کر نماز شروع کی ہو۔ اگر امام رکوع میں ہے اور آپ رکوع میں پہنچ کر اس میں شامل ہوتے ہیں تو آپ کی نماز مکمل ہو جائے گی۔ البتہ، اس بات کا دھیان رکھنا ضروری ہے کہ نماز کی ترتیب اور آداب مکمل ہوں
     اس کی دلیل یہ حدیث ہے:
    "جس نے امام کے ساتھ رکوع پایا، اس نے رکعت پالی۔"

    فقہ شافعی:

    فقہ شافعی میں بھی یہ رائے پائی جاتی ہے کہ اگر مقتدی رکوع میں امام کے ساتھ شامل ہو جائے اور امام سے پہلے رکوع سے سر نہ اٹھائے، تو اس کی رکعت شمار ہوگی۔ بشرطیکہ رکوع مکمل طور پر امام کے ساتھ ہو جائے اور مقتدی امام کے ساتھ اطمینان سے رکوع کرے۔

    مالکیہ:

    مالکیہ کے نزدیک بھی اگر مقتدی رکوع میں امام کے ساتھ شامل ہو جائے تو رکعت مل جاتی ہے، لیکن رکوع کے دوران امام کو پکڑنا شرط ہے۔ مقتدی رکوع کی حالت میں امام کے ساتھ شامل ہو اور نماز کے دیگر ارکان درست طریقے سے ادا کرے۔

    حنابلہ:

    حنابلہ کے نزدیک بھی اگر مقتدی رکوع میں شامل ہو جائے اور رکوع کی حالت میں امام کو پائے تو رکعت ہو جاتی ہے۔بشرطیکہ مقتدی رکوع کی حالت میں امام کے ساتھ شامل ہو اور نماز کے دیگر ارکان درست طریقے سے ادا کرے۔

    3. مسئلہ کی وضاحت:

    علماء اس بات پر متفق ہیں کہ:فقہ حنفیہ، شافعیہ، مالکیہ اور حنبلیہ سب ہی اس بات پر متفق ہیں کہ رکوع میں شامل ہونا نماز کے شروع ہونے کے بعد نماز کی تکمیل کا حصہ ہے۔
    اگر مقتدی امام کے رکوع میں شامل ہو جائے اور اطمینان سے رکوع کرے، تو وہ رکعت شمار ہو جاتی ہے۔
    تاہم، اگر مقتدی رکوع کے بعد شامل ہو، تو اس کی رکعت نہیں ہوگی اور اسے نماز کے آخر میں اس رکعت کو مکمل کرنا ہوگا۔

    علماء کے اقوال:

    🔅علامہ ابن تیمیہ رحمہ اللہ:

    ابن تیمیہ رحمہ اللہ کے مطابق، اگر کوئی رکوع کے دوران امام کے ساتھ شامل ہو جاتا ہے تو اس کی رکعت درست ہے، کیونکہ نبی ﷺ کے ارشاد کے مطابق رکوع پانے سے نماز مکمل ہو جاتی ہے۔

    🔅علامہ ابن قیم رحمہ اللہ:

    انہوں نے بھی اس مسئلے پر زور دیا کہ مقتدی کا رکوع میں شامل ہونا اس کی رکعت کے شمار ہونے کے لیے کافی ہے۔

    🔅مفتی تقی عثمانی:

    مفتی تقی عثمانی کے مطابق، اگر مقتدی امام کے رکوع میں شامل ہو کر تکبیر تحریمہ کے بعد فوراً رکوع کر لے، تو اس کی وہ رکعت شمار ہو جائے گی۔ لیکن اس بات کا دھیان رکھا جائے کہ یہ عمل جلد بازی کے بغیر ہو۔

    🔅امام نووی رحمہ اللہ:

    امام نووی نے اپنی کتاب المجموع میں لکھا ہے کہ اگر کوئی شخص رکوع میں امام کے ساتھ شامل ہو جائے اور امام کے ساتھ رکوع ادا کر لے، تو اس کی رکعت شمار کی جائے گی۔

    🔅ابن قدامہ رحمہ اللہ:

    ابن قدامہ نے المغنی میں ذکر کیا ہے کہ جو شخص رکوع کی حالت میں امام کو پا لے، وہ رکعت کو پا لیتا ہے، اور اس پر علماء کا اتفاق ہے۔

    🔅فتاویٰ عالمگیری (حنفی فقہ):

    اس میں واضح کیا گیا ہے کہ اگر کوئی شخص رکوع کی حالت میں شامل ہو جائے، تو اس کی رکعت صحیح ہے اور اسے دوبارہ ادا کرنے کی ضرورت نہیں۔

    رکوع میں شامل ہونے سے نماز مکمل ہو جاتی ہے، بشرطیکہ:

    مقتدی تکبیر تحریمہ کے بعد رکوع کرے۔
    امام کے رکوع میں شامل ہو اور امام کے ساتھ رکوع مکمل کرے۔
    امام کے رکوع سے پہلے یا بعد سر اٹھانے میں اختلاف نہ ہو۔

    Conclusion:

    حدیث اور علماء کے اقوال کی روشنی میں یہ بات واضح ہوتی ہے کہ رکوع میں شامل ہونے سے رکعت مل جاتی ہے، بشرطیکہ رکوع امام کے ساتھ مکمل کیا جائے اور اطمینان کا خیال رکھا جائے۔ تاہم، بہتر ہے کہ نماز کو جلدی اور سکون کے ساتھ مکمل کیا جائے تاکہ سنت کے مطابق عمل ہو۔

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    FAQs:



    सवाल: क्या रुकू में शामिल होने से नमाज़ पूरी मानी जाएगी ?

    जवाब: इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति फर्ज नमाज़ की रकअत के दौरान इमाम के रुकू में शामिल हो जाता है और समय पर तस्बीह ("सुब्हाना रब्बीयल अज़ीम") कह लेता है, तो उसकी वह रकअत मानी जाएगी। इसका अर्थ यह है कि उस व्यक्ति के लिए सूरह फातिहा और अन्य तिलावत की अदायगी उस विशेष रकअत में जरूरी नहीं रहती।यह हदीस पर आधारित है:
    रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया:
    "जिसने रुकू पा लिया, उसने रकअत पा ली।"(सुनन अबू दाऊद, हदीस: 893)

    सवाल : रुकू के दौरान कौन सी तसबीह पढ़ी जाती है?

    जवाब: रुकू के दौरान "सुब्हान रब्बियल अज़ीम" की तसबीह पढ़ना सुन्नत है। इसे तीन बार या उससे ज़्यादा बार पढ़ा जा सकता है।

    सवाल : क्या रुकू में जल्दबाज़ी करना सही है?

    जवाब: नहीं, रुकू में जल्दबाज़ी करना सुन्नत के खिलाफ़ है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि रुकू को इत्मीनान और शांति के साथ करना चाहिए। जल्दबाज़ी के बिना, पूरी तवज्जो और अदब के साथ रुकू अदा करना चाहिए।

    सवाल : रुकू से उठते समय क्या कहा जाता है?

    जवाब: रुकू से उठते समय "समिअल्लाहु लिमन हमिदह" कहा जाता है, जिसका मतलब है "अल्लाह ने उसकी सुन ली जिसने उसकी तारीफ की।" और फिर खड़े होकर "रब्बना व लकल हम्द" कहना सुन्नत है, जिसका मतलब है "ऐ हमारे रब! तेरे लिए सारी तारीफ है।"

    सवाल : रुकू में हाथ कहाँ रखें?

    जवाब: रुकू के दौरान हाथों को घुटनों पर मज़बूती से रखा जाए। उंगलियों को खुला रखा जाए ताकि घुटनों को सही तरीक़े से पकड़ सकें।




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