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Roshni kab Aati hai/रोशनी कब आती है?

"रोशनी सिर्फ आँखों से देखने का नाम नहीं, बल्कि असल हकीकत को पहचानने का नाम है। दुनिया में जगमगाते हुए दीपक और सूरज की चमक सभी को दिखती है, लेकिन असली रोशनी वही होती है जो इंसान के दिल और दिमाग को जगाए। हक और बातिल में फर्क करना, दूसरों के दर्द को महसूस करना, और बिना कहे किसी की तकलीफ को समझ लेना ही असली रोशनी  है"

Roshni kab Aati hai/रोशनी कब आती है?

Roshni kab Aati hai/रोशनी कब आती है?
Roshni kab Aati hai/रोशनी कब आती है?


यह लेख Roshni kab Aati hai?  एक नसीहत भरी हुई प्रेरणादायक रचना है। इसे जरूर पढ़ें और दूसरों तक भी पहुँचाएँ। इसमें आपको ज्ञान और हिकमत की बातें मिलेंगी। तो आइए जाने की Roshni kab Aati hai ?

रोशनी की असली पहचान


रोशनी सिर्फ आँखों से देखने का नाम नहीं, बल्कि असल हकीकत को पहचानने का नाम है। दुनिया में जगमगाते हुए दीपक और सूरज की चमक सभी को दिखती है, लेकिन असली रोशनी वही होती है जो इंसान के दिल और दिमाग को जगाए। हक और बातिल में फर्क करना, दूसरों के दर्द को महसूस करना, और बिना कहे किसी की तकलीफ को समझ लेना ही असली रोशनी और बसीरत (समझदारी) है। यही वह रोशनी है जो अंधेरे में भी रास्ता दिखाती है और इंसान को उसकी जिम्मेदारियों का एहसास कराती है।

रोशनी कब आती है?

Roshni aur andhera
Roshni kab Aati hai/रोशनी कब आती है?


हज़रत नसीरुद्दीन चिराग़ देहलवी (रह.) एक दिन अपने मुरीदों के साथ मजलिस में बैठे थे। उन्होंने एक हिकमत भरा सवाल पूछा:

"रोशनी कब आती है?"
एक मुरीद ने अदब से जवाब दिया:
"जब सफेद और काले धागे में फर्क नजर आने लगे, तो यही रोशनी है।"
दूसरे मुरीद ने कहा:
"जब दूर खड़े पेड़ों में बेर और शीशम का फर्क मालूम हो जाए, तो यह रोशनी है।"
हज़रत ने उन हाजिरीनों पर नजर दौड़ाई, मगर कोई और जवाब न आया। तब आपने फरमाया:
"जब तुम जरूरतमंद के चेहरे पर उसकी जरूरत पढ़ सको, तो जान लो कि रोशनी आ चुकी है।"

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"जिस दिल में दूसरों के दर्द को महसूस करने की सलाहियत न हो, वह रोशनी में भी अंधा है। रोशनी हमेशा बाहर मत तलाश करो, कभी अपने अंदर भी झाँक लो

हक और बातिल में फर्क


अगर इंसान हक और बातिल में फर्क न कर सके, तो ज़ाहिरी रोशनी बेकार है। असली रोशनी वह है जब किसी के पास अपने दर्द और तकलीफ को बयान करने के लिए अल्फाज न हों, लेकिन सुनने वाला अपने इल्म और हिकमत से उसकी हालत जान ले।

जहाँ साइल (मांगने वाले) को अपनी जरूरत बयान करने की जरूरत न पड़े, वहाँ रोशनी मौजूद होती है। और जहाँ जहालत का घना अंधेरा हो, लेकिन फिर भी कोई अपने और दूसरों के लिए सीधा रास्ता ढूंढ ले, तो वही असली रोशनी है।

"जिस दिल में दूसरों के दर्द को महसूस करने की सलाहियत न हो, वह रोशनी में भी अंधा है। रोशनी हमेशा बाहर मत तलाश करो, कभी अपने अंदर भी झाँक लो।"

अंधेरा कब खत्म होता है?

Andhera kab Khatm hota hai
Roshni kab Aati hai/रोशनी कब आती है?

"हम में से अधिकतर लोग हक और बातिल में फर्क करने को सिर्फ ज़ाहिरी चीजों से जोड़ते हैं। मगर असली फर्क तब जाहिर होता है जब एक इंसान दूसरे की तकलीफ को बिना बोले समझने लगे। सच्ची रोशनी वही होती है जो अंधेरे में रास्ता दिखाए, और असली नजर वही होती है जो दिल की सच्चाई को पहचान ले।,


एक दरवेश किसी गाँव में ठहरा। चूँकि सफर के दौरान शाम का वक्त हो गया था, इसलिए उसने उसी गाँव में रुकने का फैसला किया। अंधेरी रात थी, चराग जल रहे थे। उसके इर्द-गिर्द कुछ गाँव वाले बैठे थे। दरवेश ने उनसे पूछा:

"कोई बताएगा कि अंधेरा कब खत्म होता है?"

एक नौजवान ने फौरन जवाब दिया:
"जब सूरज निकलता है और रोशनी फैल जाती है।"

दूसरे ने कहा:
"जब रात के साये खत्म हो जाते हैं और दिन की रोशनी हर चीज को उजागर कर देती है।"
दरवेश ने मुस्कराकर सबको देखा और कहा:

यह सब सच है, मगर असली अंधेरा तब खत्म होता है, जब तुम्हें किसी गरीब के चेहरे पर उसकी भूख का एहसास हो, किसी मजबूर की आँखों में उसकी बेबसी दिखाई दे, और जब तुम दूसरों की तकलीफ को अपने दिल की आँख से महसूस कर सको।

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रोशनी और अंधेरे की हकीकत


दुनिया में रोशनी की कमी नहीं है, दीपक जलते हैं, सूरज चमकता है, लेकिन समझदारी (बसीरत) रखने वाले बहुत कम होते हैं। ज़ाहिरी आँख रोशनी देख सकती है, लेकिन असली नजर वह होती है जो दिल में जागती है। अगर कोई मजलूम के दर्द को महसूस नहीं कर सकता, अगर किसी की खामोशी में छुपे सवाल को नहीं समझ सकता, तो वह रोशनी में भी अंधेरे में है।

हम में से अधिकतर लोग हक और बातिल में फर्क करने को सिर्फ ज़ाहिरी चीजों से जोड़ते हैं। मगर असली फर्क तब जाहिर होता है जब एक इंसान दूसरे की तकलीफ को बिना बोले समझने लगे। सच्ची रोशनी वही होती है जो अंधेरे में रास्ता दिखाए, और असली नजर वही होती है जो दिल की सच्चाई को पहचान ले।

"रोशनी सिर्फ चरागों में नहीं, दिलों में भी होनी चाहिए। अगर कोई इंसान दूसरों के दर्द को महसूस करने लगे, अपने हाथों को सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों की मदद के लिए बढ़ाए, और अपनी जबान से ऐसे अल्फाज निकाले जो दिलों को जोड़ने का जरिया बनें, तो यही असली रोशनी है। क्योंकि रोशनी वह नहीं जो सिर्फ आँखों को देखने की सलाहियत दे, बल्कि वह है जो दिलों को जगा दे।"


निष्कर्ष (Conclusion)


ज़ाहिरी रोशनी वक़्ती होती है, मगर दिल की रोशनी हमेशा कायम रहती है। जो लोग दूसरों के दर्द को महसूस करते हैं, जरूरतमंदों की जरूरत को बिना कहे समझ लेते हैं, और अपने इल्म व हिकमत से दूसरों के लिए आसानी पैदा करते हैं, वही असल में रोशनी के हकदार होते हैं। यह रोशनी दिलों में हो तो समाज अमन और मुहब्बत का गहवारा बन जाता है। इसलिए रोशनी को सिर्फ देखने तक महदूद मत करें, बल्कि इसे महसूस करें, अपनाएँ, और दूसरों तक पहुँचाएँ।

"रोशनी देखने का नाम नहीं, रोशनी महसूस करने का नाम है।"

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